उत्तराखंड के स्कूलों में अवकाश व्यवस्था में बदलाव की तैयारी, शिक्षकों को मिल सकता है 11 दिन का अतिरिक्त उपार्जित अवकाश ।

 


उत्तराखंड के स्कूलों में अवकाश व्यवस्था में बदलाव की तैयारी, शिक्षकों को मिल सकता है 11 दिन का अतिरिक्त उपार्जित अवकाश

उत्तराखंड में विद्यालयों के संचालन की समय-सारिणी में बदलाव के बाद अब शिक्षकों और कर्मचारियों की छुट्टियों की व्यवस्था में भी परिवर्तन की संभावना दिखाई दे रही है। सरकार की ओर से राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT) द्वारा ग्रीष्मकालीन तथा शीतकालीन अवकाश में कटौती के प्रस्ताव की गंभीरता से समीक्षा की जा रही है। प्रस्ताव का उद्देश्य विद्यालयों में शिक्षण कार्य के लिए उपलब्ध दिनों और शिक्षकों को मिलने वाले अवकाश के बीच संतुलन स्थापित करना है

उत्तराखंड के स्कूलों में अवकाश व्यवस्था में बदलाव की तैयारी, शिक्षकों को मिल सकता है 11 दिन का अतिरिक्त उपार्जित अवकाश

वर्तमान व्यवस्था में बदलाव की तैयारी

समाचार के अनुसार, राज्य में विद्यालयों के संचालन का टाइम टेबल संशोधित किए जाने के बाद अब गर्मी और सर्दी की छुट्टियों की व्यवस्था पर भी पुनर्विचार किया जा रहा है। सरकार यह देख रही है कि अवकाश की वर्तमान व्यवस्था को किस प्रकार अधिक व्यावहारिक बनाया जाए, ताकि विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित न हो और शिक्षकों को भी उनके कार्य के अनुरूप पर्याप्त अवकाश मिल सके।

सरकार ने इस विषय पर SCERT के माध्यम से ग्रीष्मकालीन और शीतकालीन अवकाश में कटौती के प्रस्ताव की समीक्षा शुरू की है। इसके तहत शिक्षकों को 11 दिनों का उपार्जित अवकाश (Earned Leave) दिए जाने की संभावना पर विचार किया जा रहा है।

तीन दिन का विशेष अवकाश भी हो सकता है समाप्त

समाचार में उल्लेख है कि वर्ष 2016 में तत्कालीन हरीश रावत सरकार ने 22 सितंबर को शिक्षकों को तीन दिन का विशेष अवकाश देने का निर्णय लिया था। यह व्यवस्था उत्तराखंड में उस समय लागू की गई थी जब राज्य में 10 ईएल (Earned Leave) की व्यवस्था के साथ शिक्षकों को वर्तमान व्यवस्था के अनुसार अतिरिक्त अवकाश मिलता था।

अब यदि वर्ष में 10 ईएल के स्थान पर 11 ईएल का प्रावधान किया जाता है, तो वर्ष 2016 से लागू तीन दिन के विशेष अवकाश को समाप्त करने अथवा उसमें बदलाव करने पर विचार किया जा सकता है। SCERT ने अपने प्रस्ताव में इस दिशा में भी विचार करने का अनुरोध किया है।

48 दिन के शीतकालीन और ग्रीष्मकालीन अवकाश पर भी पुनर्विचार

प्रस्ताव का एक महत्वपूर्ण पक्ष शिक्षकों के कुल अवकाश को व्यवस्थित करना है। समाचार के अनुसार वर्तमान व्यवस्था में शिक्षकों को वर्ष में लगभग 48 दिन का शीतकालीन एवं ग्रीष्मकालीन अवकाश मिलता है। प्रस्ताव में इन अवकाशों में से कुछ दिनों को कम करके लगभग 32 दिन करने की बात कही गई है।

इसके साथ ही शेष दिनों के समायोजन के लिए शिक्षकों को 10 या 11 दिनों का उपार्जित अवकाश दिए जाने की व्यवस्था पर विचार किया जा रहा है। इस प्रकार सरकार का उद्देश्य अवकाश के कुल स्वरूप में परिवर्तन करना है, न कि केवल छुट्टियों को समाप्त करना।

शिक्षकों के लिए क्या होगा इसका अर्थ?

यदि यह प्रस्ताव लागू होता है, तो शिक्षकों की छुट्टियों का स्वरूप वर्तमान व्यवस्था से अलग हो जाएगा। लंबे ग्रीष्मकालीन और शीतकालीन अवकाश के बजाय कुछ दिनों की कटौती करके उन्हें उपार्जित अवकाश के रूप में उपलब्ध कराया जा सकता है।

इस व्यवस्था का एक संभावित लाभ यह होगा कि शिक्षक अपने व्यक्तिगत या पारिवारिक कार्यों के लिए उपार्जित अवकाश का उपयोग आवश्यकता के अनुसार कर सकेंगे। यानी अवकाश केवल निर्धारित गर्मी या सर्दी की छुट्टियों तक सीमित न रहकर अधिक लचीला हो सकता है।

हालांकि, इसके साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि शिक्षकों के कार्यदिवस, विद्यालयी गतिविधियों, प्रशिक्षण, परीक्षा, मूल्यांकन और विद्यार्थियों की शैक्षणिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर अंतिम व्यवस्था बनाई जाए।

शिक्षक संगठनों की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण

राज्य में शिक्षक लंबे समय से गर्मी और सर्दी की छुट्टियों के स्थान पर ईएल की व्यवस्था की मांग करते रहे हैं। समाचार में शिक्षक संगठनों के पदाधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि यदि सरकार दीर्घकालीन अवकाश के साथ ईएल की सुविधा उपलब्ध कराती है, तो शिक्षक इसका स्वागत कर सकते हैं।

इस मुद्दे पर शिक्षक संगठनों की राय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भी अवकाश व्यवस्था का सीधा प्रभाव शिक्षकों के कार्य-जीवन संतुलन, विद्यालयी प्रशासन और विद्यार्थियों के शिक्षण पर पड़ता है।

आगे क्या हो सकता है?

फिलहाल यह विषय प्रस्ताव और समीक्षा के स्तर पर है। अंतिम निर्णय सरकार द्वारा सभी संबंधित पक्षों से विचार-विमर्श के बाद लिया जाना है। वित्त विभाग की आपत्तियों और उनके जवाब पर भी विचार किया जा रहा है।

इसलिए शिक्षकों और विद्यालयी कर्मचारियों के लिए यह स्पष्ट समझना आवश्यक है कि जब तक शासनादेश जारी नहीं होता, तब तक वर्तमान अवकाश व्यवस्था को बदला हुआ मानना उचित नहीं होगा।

निष्कर्ष

उत्तराखंड में विद्यालयों की अवकाश व्यवस्था में प्रस्तावित बदलाव केवल छुट्टियों की संख्या से संबंधित विषय नहीं है, बल्कि यह शिक्षकों के कार्यदिवस, उपार्जित अवकाश, विद्यालयी समय-सारिणी और विद्यार्थियों के शिक्षण दिवस से जुड़ा व्यापक प्रशासनिक निर्णय है।

यदि सरकार 48 दिनों के शीतकालीन-ग्रीष्मकालीन अवकाश में कमी करके 10–11 दिनों के उपार्जित अवकाश की व्यवस्था करती है, तो शिक्षकों को अवकाश लेने में अधिक लचीलापन मिल सकता है। दूसरी ओर, यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक होगा कि अवकाश में कमी का प्रभाव शिक्षकों के कार्यभार और विद्यार्थियों की शैक्षणिक गुणवत्ता पर प्रतिकूल न पड़े।

अतः शिक्षित साथियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस प्रस्ताव को अभी अंतिम निर्णय न मानते हुए शासन के आधिकारिक आदेश की प्रतीक्षा की जाए।

शिक्षक भास्कर जोशी ।
व्हाट्सएप :मेरे राष्ट्रीय शैक्षिक समूह में आपका स्वागत है ।


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