🎭 लघु नाटक
“बंदूक की खेती”
पात्र:
बालक भगत सिंह
पिता (किशन सिंह)
दृश्य:
(मंच पर खेत का वातावरण। एक ओर हल्की-सी मेज/चटाई जहाँ पिता की बंदूक रखी है। पिता खेत में बीज बो रहे हैं।)
संवाद
पिता (बीज बोते हुए):
मेहनत से बोया हुआ बीज ही अच्छी फसल देता है।
(भगत सिंह दौड़ते हुए आते हैं।)
भगत सिंह:
पिताजी! आप क्या कर रहे हैं?
पिता (मुस्कुराकर):
बेटा, मैं गेहूँ के बीज बो रहा हूँ। कुछ दिनों में ये फसल बनेंगे।
भगत सिंह (सोचते हुए):
तो जो बोते हैं, वही उगता है?
पिता:
हाँ बेटा, जैसा बीज, वैसी फसल।
(भगत सिंह पास रखी पिता की बंदूक को उठाते हैं।)
पिता (चौंककर):
अरे बेटा! उसे संभालकर… यह मेरी बंदूक है।
भगत सिंह (दृढ़ स्वर में):
पिताजी, आप तो कहते हैं हमारा देश गुलाम है… और आप भी तो अंग्रेजों के खिलाफ लड़ते हैं।
तो क्या मैं भी ऐसी बंदूक बो दूँ, ताकि पूरे खेत में बंदूकें उगें?
पिता (हल्की मुस्कान और आश्चर्य के साथ):
बेटा, बंदूक खेत में नहीं उगती।
भगत सिंह (जोश में):
तो फिर मैं अपने दिल में आज़ादी का बीज बोऊँगा!
जब मैं बड़ा हो जाऊँगा, तो इस बंदूक से अपने देश को आज़ाद कराऊँगा!
(कुछ क्षण का मौन। पिता भावुक हो जाते हैं।)
पिता (गर्व से):
मेरे वीर बेटे… सच्चा क्रांतिकारी पहले अपने विचारों को मजबूत बनाता है।
अगर तुम्हारे मन में देशप्रेम का बीज है, तो एक दिन स्वतंत्रता की फसल जरूर उगेगी।
भगत सिंह (हाथ उठाकर):
मैं वचन देता हूँ — मैं भारत माता की सेवा करूँगा!
(पिता बेटे के कंधे पर हाथ रखते हैं।)
पिता और पुत्र साथ में:
वन्दे मातरम्!
जय हिन्द!
✨ समापन संदेश (दोनों मिलकर)
“जब दिल में देशप्रेम का बीज बोया जाता है,
तो स्वतंत्रता की फसल अवश्य उगती है।”

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